Father And Son - बाप और बेटे की दुश्मनी की कहानी | पिता–पुत्र के झगड़े की भावनात्मक दास्तान
बाप और बेटे की दुश्मनी – एक गहरी कहानी
प्रस्तावना
रिश्तों में सबसे पवित्र माना जाने वाला रिश्ता अगर कहीं सबसे ज़्यादा टकराव झेलता है, तो वह है बाप और बेटे का रिश्ता। यह कहानी उसी टकराव की है—अहंकार, उम्मीदों, ज़िद, गलतफहमियों और समय के साथ गहराती दुश्मनी की। यह सिर्फ़ झगड़े की कहानी नहीं, बल्कि टूटते रिश्ते, दबे हुए जज़्बात और अंततः समझ की तलाश की दास्तान है।
अध्याय 1: मजबूत जड़ें, कठोर छाया
रामशंकर एक सख़्त मगर ईमानदार आदमी था। गाँव में उसकी पहचान अनुशासन और मेहनत से बनी थी। खेत, बैल और सुबह की ठंडी हवा—यही उसका संसार था। उसका बेटा अमित शहर में पढ़ा-लिखा, नए सपनों से भरा हुआ था। जहाँ रामशंकर को परंपरा की मज़बूत जड़ें दिखती थीं, वहीं अमित को वही जड़ें बेड़ियाँ लगती थीं।
रामशंकर चाहता था कि अमित खेती संभाले, ज़मीन को छोड़कर कहीं न जाए। अमित का मन कंप्यूटर, शहर और नए अवसरों में था। यही से पहली दरार पड़ी—बातें कम और ताने ज़्यादा होने लगे।
अध्याय 2: उम्मीदों का बोझ
अमित की हर सफलता पर रामशंकर की खामोशी चुभती थी। उसे लगता, बाप उसकी क़ाबिलियत नहीं समझता। उधर रामशंकर को लगता, बेटा उसकी मेहनत का अपमान कर रहा है। उम्मीदों का बोझ इतना भारी था कि दोनों के शब्द तलवार बन गए।
एक दिन खेत में बहस बढ़ी—आवाज़ें ऊँची हुईं, हाथ काँपे और रिश्ते की नींव हिल गई। रामशंकर ने कहा, “मेरे घर में रहना है तो मेरी बात माननी होगी।” अमित ने जवाब दिया, “तो मैं नहीं रहूँगा।”
अध्याय 3: अलग रास्ते
अमित शहर चला गया। कमरा छोटा था, सपने बड़े। नौकरी मिली, दोस्त बने, मगर दिल में खालीपन था। रामशंकर ने बाहर से सख़्ती ओढ़ ली, पर रातों में अकेले बैठकर बेटे की तस्वीर देखता। गाँव में लोग पूछते, “अमित कब आएगा?” जवाब में बस एक सन्नाटा।
अध्याय 4: ज़िद की आग
समय बीतता गया। बात-बात पर पुरानी बातें निकल आतीं। त्योहारों पर फोन भी औपचारिक हो गया। दोनों अपनी-अपनी ज़िद में सही साबित होना चाहते थे। यह ज़िद धीरे-धीरे दुश्मनी बन गई—ऐसी दुश्मनी जिसमें हार-जीत से ज़्यादा अहम अहंकार था।
अध्याय 5: समाज का दबाव
गाँव के लोग कहते, “बेटा बाप से लड़कर कहाँ सुखी रहा है?” शहर के दोस्त कहते, “पुरानी सोच छोड़ो।” अमित दो पाटों में पिसता रहा। रामशंकर पर भी पंचायत का दबाव था—“घर का लड़का बाहर, यह इज़्ज़त की बात नहीं।”
अध्याय 6: टूटते सेतु
एक दिन खेत में नुकसान हुआ। रामशंकर ने मदद के लिए फोन किया, पर आवाज़ में गुस्सा था। अमित पहुँचा, पर बात बनते-बनते बिगड़ गई। पुराने घाव फिर हरे हो गए। दोनों ने ऐसी बातें कह दीं, जो नहीं कहनी चाहिए थीं।
अध्याय 7: पछतावे की दस्तक
कुछ महीनों बाद रामशंकर बीमार पड़ा। अमित को खबर मिली। अस्पताल के गलियारे में खड़े होकर उसे एहसास हुआ—दुश्मनी ने कितना समय खा लिया। उधर रामशंकर को लगा, सख़्ती ने बेटे को दूर कर दिया।
अध्याय 8: मौन की भाषा
अस्पताल में पहली मुलाक़ात बिना शब्दों के हुई। आँखों में सवाल थे, जवाब नहीं। डॉक्टर की सलाह, दवाइयाँ और लंबी रातें—इन्हीं के बीच दोनों ने मौन में बात करना सीखा।
अध्याय 9: स्वीकार की शुरुआत
रामशंकर ने पहली बार कहा, “शायद मैं गलत था।” अमित की आँखें भर आईं। उसने भी माना, “मैं समझ नहीं पाया।” यह स्वीकार आसान नहीं था, पर ज़रूरी था।
अध्याय 10: नई सुबह
बीमारी के बाद घर में बदलाव आया। अमित ने खेती में तकनीक लाई, रामशंकर ने उसे आज़ादी दी। दुश्मनी पूरी तरह मिट नहीं, पर समझ ने जगह बना ली।
उपसंहार
यह कहानी बताती है कि बाप-बेटे की दुश्मनी अक्सर प्रेम की ही एक उलझी हुई शक्ल होती है। जब संवाद रुकता है, अहंकार बोलता है। और जब अहंकार थकता है, तब रिश्ते सांस लेते हैं।
समाप्त
Post By - The Shayari World Official

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